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मंगलवार, 4 मार्च 2025

मुजफ्फरपुर का गरीवनाथ मंदिर: आस्था और इतिहास का अद्वितीय संगम बाबा गरीबनाथ शिव मंदिर बिहार


मुजफ्फरपुर का गरीवनाथ मंदिर: आस्था और इतिहास का अद्वितीय संगम बाबा गरीबनाथ शिव मंदिर  बिहार

 


बाबा गरीबनाथ शिव मंदिर  बिहार राज्य के मुजफ्फरपुर शहर में है यहाँ आने के लिए आपको देश के सभी भागो से सीधी ट्रेन और सड़क की सुविधा हैं हवाई मार्ग से आने के लियें आपको बिहार की राजधानी पटना ही आना होगा जहा आने के लिए देश के सभी भागो से हवाई सुविधा उपलवध है मुजफ्फरपुर रेलवे जंक्शन देश के सभी रेल मार्गो से पूरी तरह ज़ुरा हुआ है यहाँ देश के संही भागो से आप सीधे ट्रेन से आ सकते है सड़क मार्गो से भी मुजफ्फरपुर आने के लिए देश के सभी और से पूरी सुविधा है आप अपनी सुविधा के अनुसार यहाँ आ सकते है

मुजफ्फरपुर का गरीवनाथ मंदिर: आस्था और इतिहास का अद्वितीय संगम

भारत में हर राज्य और शहर में धार्मिक स्थलों की एक अद्भुत धरोहर है, जो न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी होती है, बल्कि उन स्थलों से जुड़ी हुई कथाएँ और इतिहास भी हमें हमारे अतीत की याद दिलाती हैं। बिहार राज्य के मुजफ्फरपुर जिले में स्थित गरीवनाथ मंदिर एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जो अपनी आध्यात्मिकता, ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक धरोहर के कारण श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यह मंदिर न केवल भगवान के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का भी अभिन्न हिस्सा है।

बाबा गरीबनाथ शिव मंदिर  मुजफ्फ्फर शहर में ही है मुजफ्फर रेलवे स्टेशन से आपको यहाँ के लिए सीधे ऑटो मिल जायेगी स्टेशन से मंदिर की दुरी करीब २ किलोमीटर है आप पैदल भी शहर का नजारा देखते मंदिर तक जा सकते है मंदिर मुख्य सड़क के किनारे ही बना हुआ है मंदिर काफी सुन्दर और अच्छा है

गरीवनाथ मंदिर का इतिहास और महत्व

गरीवनाथ मंदिर का ऐतिहासिक महत्व बहुत पुराना है। इस मंदिर का संबंध पौराणिक कथाओं से है, जो इसे एक प्राचीन और धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित करती हैं। यह मंदिर विशेष रूप से भगवान विष्णु के एक रूप "गरीवनाथ" को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के इस रूप की पूजा भक्तों को दरिद्रता से मुक्ति दिलाती है और उन्हें समृद्धि की ओर मार्गदर्शन करती है। यही कारण है कि इस मंदिर को विशेष रूप से गरीबों और जरूरतमंदों के लिए आस्था का केंद्र माना जाता है।

बाबा गरीबनाथ शिव मंदिर के शिवलिंग कब प्रकट हुआ ये नहीं कहा जा सकता क्योकि इसका कोई ठीक ठिक प्रमाण नहीं है इस मंदिर का निर्माण कब हुआ ये ठीक से नहीं कहा जा सकता है

इस मंदिर के निर्माण या प्रकट होने की कथा है की एक मजदुर ने एक पैर की कटाई के दोरान इस शिव लिंग पर उसकी कुल्हारी पर गयी थी जिसके निशान अभी भी शिव लिंग पर है जिसके कारन इस शिव मंदिर का नाम गरीबनाथ मंदिर पड़ा

मंदिर का इतिहास इस क्षेत्र में कई शताब्दियों पुराना है। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना बहुत पहले की गई थी, और यह स्थान समय के साथ एक प्रमुख धार्मिक स्थल बन गया। वर्षों से यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान गरीवनाथ से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहाँ आते हैं। उनकी आस्था और विश्वास इस मंदिर के प्रति अनमोल हैं, जो इसे एक जीवित धरोहर बनाता है।

मंदिर का वास्तुशिल्प और संरचना

गरीवनाथ मंदिर का वास्तुकला अत्यंत आकर्षक और भव्य है। मंदिर का निर्माण भारतीय पारंपरिक वास्तुकला के अनुसार किया गया है। मंदिर की संरचना में लकड़ी और पत्थर का उपयोग किया गया है, जो इसे एक विशिष्ट रूप प्रदान करता है। मंदिर का गर्भगृह भगवान गरीवनाथ की प्रतिमा से सुसज्जित है, जो भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है।

मंदिर के प्रवेश द्वार पर बनी नक्काशी और शिल्पकारी इस स्थल की ऐतिहासिक धरोहर को दर्शाती हैं। मंदिर के चारों ओर फैली हुई हरियाली और फूलों से सजे बगीचे एक अत्यंत शांत और आध्यात्मिक वातावरण उत्पन्न करते हैं। यहाँ का वातावरण भक्तों को मानसिक शांति और समृद्धि का अहसास कराता है। मंदिर के आंगन में स्थित पूजा स्थल पर लोग भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं, और यहाँ आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान भी श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।

गरीवनाथ मंदिर का धार्मिक महत्व

गरीवनाथ मंदिर का धार्मिक महत्व बहुत गहरा है। इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु न केवल पूजा करते हैं, बल्कि अपने दुखों और परेशानियों का निवारण करने के लिए यहां मनोबल भी प्राप्त करते हैं। मंदिर में विशेष रूप से गरीबों और दुखी लोगों की मदद की जाती है, और यही कारण है कि इसे गरीबों का मंदिर भी कहा जाता है।

यहां हर साल विशेष अवसरों पर भव्य पूजा और अनुष्ठान आयोजित होते हैं। विशेष रूप से रामनवमी और दशहरा जैसे त्योहारों के दौरान मंदिर में भारी भीड़ होती है। इन दिनों में मंदिर को सजाया जाता है, और श्रद्धालु भगवान की भक्ति में लीन होकर पूजा अर्चना करते हैं। इसके अलावा, महा शिवरात्रि और नवरात्रि के दौरान भी यहाँ विशेष आयोजन होते हैं, जिसमें भक्तों की भारी संख्या देखी जाती है।

मंदिर का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यहाँ पर आने वाले श्रद्धालु भगवान गरीवनाथ से अपनी समस्याओं का समाधान पाने के लिए मन से प्रार्थना करते हैं। यह मान्यता है कि इस मंदिर में आने से व्यक्ति के जीवन में खुशहाली आती है और वह गरीबी और दरिद्रता से उबरता है।

गरीवनाथ मंदिर में होने वाली विशेष पूजा

गरीवनाथ मंदिर में विशेष पूजा की व्यवस्था की जाती है, जो हर दिन और खास पर्वों पर होती है। यहाँ पर भगवान गरीवनाथ की विशेष पूजा अर्चना की जाती है, जिसमें भक्त शुद्धता से स्नान कर भगवान की प्रतिमा को स्नान कराते हैं और फिर दीपक, अगरबत्ती, फूल, और प्रसाद चढ़ाते हैं। मंदिर में पूजा के दौरान मंत्रोच्चारण और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है, जिससे वातावरण में एक दिव्य शांति का अहसास होता है।

विशेष पूजा के दौरान, श्रद्धालु अपने दुखों और समस्याओं को भगवान के सामने रखकर उनके समाधान की प्रार्थना करते हैं। यहां के पुजारी भी श्रद्धालुओं की इच्छाओं और समस्याओं के समाधान के लिए पूजा करते हैं, जिससे भक्तों को आंतरिक शांति मिलती है।



मंदिर तक कैसे पहुंचे?

गरीवनाथ मंदिर मुजफ्फरपुर शहर के केंद्र से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ तक पहुँचने के लिए पर्यटकों को आसानी से सड़क मार्ग का सहारा लिया जा सकता है। मुजफ्फरपुर शहर के मुख्य बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से टैक्सी, ऑटो, और बस सेवाएँ उपलब्ध हैं, जो श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुँचाने में मदद करती हैं। इसके अलावा, मंदिर के आसपास भी आवासीय सुविधाएं उपलब्ध हैं, जहां श्रद्धालु ठहर सकते हैं।

मंदिर का वातावरण बहुत शांत और आध्यात्मिक है, और यहां की यात्रा किसी भी भक्त के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होती है।

 

इस बाबा गरीबनाथ शिव मंदिर  के मन्दिर के शिव लिंग पर जल चढाने के लिए सावन माह में काफी भीड़ होती है भक्त गंगा जल कांवर में लाकर इस शिव लिंग पर जल अर्पित करते है

बाबा गरीबनाथ शिव मंदिर  के प्रागन में एक कल्प ब्रिक्ष है जिसकी काफी पूजा होती है  

निष्कर्ष

गरीवनाथ मंदिर मुजफ्फरपुर का एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है, जो न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का भी एक अभिन्न हिस्सा है। यहां की वास्तुकला, पूजा पद्धतियाँ, और मंदिर का वातावरण एक अद्भुत अनुभव प्रदान करते हैं। यदि आप बिहार के धार्मिक स्थलों की यात्रा करना चाहते हैं, तो गरीवनाथ मंदिर निश्चित रूप से एक ऐसा स्थान है, जो आपको आस्था, शांति, और समृद्धि का अहसास कराएगा।

 लेखक स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज 

कन्दाहा का सूर्य मंदिर -एक अनुपम आलोकिक सूर्यमंदिर

 

कन्दाहा का सूर्य मंदिर एक अनुपम आलोकिक सूर्यमंदिर

कन्दाहा का सूर्य मंदिर  बिहार राज्य के सहरसा जिले के महिषी ब्लाक में है यहाँ जाने के लिए आपको देश के किसी भी कोने से बिहार की राज्यधानी पटना आना होगा जहा से आपको सहरसा के लिए रेल सड़क की पूरी सुविधा उपलध है आप देश के किसी भी कोने से पटना या सीधे सहरसा पहुचे सहरसा पुरे देश से सड़क और रेल मार्ग से पूरी तरह ज़ुरा हुआ है आप अपनी सुविधा के अनुसार सहरसा पहुचे सहरसा हवाई मार्ग से सीधे ज़ुरा हुआ नहीं है यहाँ  आने के लिए के लिए आपको बिहार के पटना के हवाई अड्डा या दरभंगा के हवाई अड्डा आना होगा जहा से सहरसा आप सीधे रेल या सड़क से आ सकते है पटना से सहरसा की दुरी २१४ किलोमीटर और दरभंगा से सहरसा की दुरी 100 किलोमीटर है जहा से हर समय बस या ट्रेन सहरसा के लिए मिल जाती है

कन्दाहा का सूर्य मंदिर सहरसा रेलवे स्टेशन से करीब १२ किलोमीटर की दुरी पर पश्चिम की और है सहरसा से हर समय कन्दाहा सूर्य मंदिर जाने के लिए आपको ऑटो मिल जाएगी जो आपको सीधे कन्दाहा का सूर्य मंदिर के मंदिर परिसर पंहुचा देगी

कन्दाहा का सूर्य मंदिर कन्दाहा पंचायत में है सहरसा से जब आप अपने वाहन से या ऑटो से  कन्दाहा का सूर्य मंदिर की और जायेंगे तो आपको सीधे सड़क से  महिषी जाने बालि सड़क से जाना होगा आगे बनगाव् से करीब २ किलोमीटर आगे एक गोरहो चौक मिलेगा जहा से आप उत्तेर की और मुर कर जाने बालि सड़क से सीधे कन्दाहा की और चले जायेंगे  जहा से कन्दाहा का सूर्य मंदिर बिलकुल सड़क के किनारे ही उत्तेर की और है सामने गेट बना हुआ है मंदिर के अन्दर आप जैसे प्रवेश करेंगे आप को एक अजीब सी अनुभूति का होगी इस मंदिर के परिसर में सूर्य के गर्मी का कोई पता नहीं चलेगा

कन्दाहा का सूर्य मंदिर भगवान् कृष्ण के पुत्र साम्भ ने बनबाया था कहते है की जब साम्भ कुस्ट रोग से पिरित हो गए थे तब उसने देश के बिभिन जगहों पर सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था जिससे उसे इस कुश्ट रोग से मुक्ति मिली थी इस कन्दाहा का सूर्य मंदिर के परिसर में एक कुआ है कहते है की इस कुआ के जल से स्नान करने से और सूर्य भगवान् का चरणामृत पिने से सफ़ेद दाग या  चरम रोग से मुक्ति मिल जाती है  जिसके कारन यहाँ भक्त सच्चे मन से यहाँ अपनी मनोकामनाय लेकर यहाँ सूर्य मंदिर पहुचते है यहाँ आने के बाद भक्तो की मनोकामनाए जरुर पूरी होती है यहाँ के सरोवर में कार्तिक और चेत्र महीने में छठ पूजा बड़े धूमधाम से मनाया जाता है  कन्दाहा का सूर्य मंदिर काफी पुराना है इस मंदिर के मुख्य गेट पर लगे शिला लेख्य को आज तक कोई पढ़ नहीं पाया है इस मंदिर के अन्दर मुख्य रूपसे सूर्य देव की मूर्ति है जिसमे काले पथरो से निर्मित भगवान् सूर्य की प्रतिमा है मंदिर के मूर्ति का निर्माण शायद द्वापर युग में हुआ होगा इसकी शेली प्राचीन नगर शेली से काफी मिलती जुलती है मंदिर एक उचे टीले पर बना हुआ है इसके चारो और काफी शांति महशुस होता है यहाँ पूजन के लिए यहाँ के पुजारी हर समय उपलध रहते है जो आपको मामूली शुल्क पर यहाँ पूजा करवा देंगे

कन्दाहा का सूर्य मंदिर काफी सुन्दर और रमणीक है यहाँ का धीरे धीरे बिकास हो रहां है मंदिर को काफी बिकास की जरुरत है मंदिर के परिसर में कई छोटे छोटे और मंदिर है जिसमे आप दर्शन पूजन कर सकते है

कन्दाहा का सूर्य मंदिर गाँव में होने के कारन यहां रहने की कोई सुविधा नहीं है  यहाँ बगल में कुछ फुल और प्रसाद की छोटी दुकाने है मंदिर के आस पास भोजन अवम खाने पिने की कोई सुविधा नहीं है यहां से थोरी दूर पर गोरहो  चौक पर खाने पिने की कुछ दुकाने है जहा आप जाकर खा पि सकते है  आप दर्शन पूजन कर बापस सहरसा शहर आकर यहाँ रुक सकते है सहरसा शहर में काफी निज्जी होटल है जहा काफी किराये पर रुम आशानी से मिल जाते है कन्दाहा का सूर्य मंदिर आस पास काफी सुन्दर प्राकृतिक नज़ारे है कुछ ही दुरी पर महिषी का तारा पीठ  कारू बाबा का स्थान देवन बन महांदेव मंदिर कोशी नदी पास में ही है जहा जाकर आप धूम सकते है

कन्दाहा का सूर्य मंदिर आने के बाद आप पुरे सहरसा के सभी दर्शनीय स्थलों के दर्शन के लिए आप लोकल टेक्सी रिजर्व कर ले जो आपको पुरे सहरसा जिले के सभी दर्शनीय स्थलों का भ्रमण करवा देगा

 

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लेखक स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज

यह लेख कॉपीराईट एक्ट के अधीन है

शनिवार, 1 मार्च 2025

सूर्यदेव देव मंदिर औरंगाबाद बिहार-most popular sun temple in india –

Most popular sun temple in india –सूर्यदेव देव मंदिर औरंगाबाद बिहार 


सूर्य देव मंदिर औरंगाबाद बिहार राज्य के  औरंगाबाद जिले के देव में है आपको जहा जाने के लिए  पहले बिहार की राजधानी पटना आना होगा  सड़क मार्ग से जाने के लिए पटना से देव औरंगाबाद की दुरी करीब १६० किलोमीटर है देव  के लिए पटना से हर समय  बस की सुविधा उपलध है जो अरवल ब्रिक्रम से होकर गुजरता है यह n h ९६ पर है  रेल से जाने के लिए आपको अनुग्रह नारायण रोड देव रेलवे स्टेशन जाना होगा जो चारो और से ज़ुरा हुआ है जहा से मंदिर की दुरी लगभग ३० किलोमीटर है जहा से आप बस या टैक्सी से देव मंदिर आशानी से जा सकते है  हवाई मार्ग से जाने के लिए आपको बिहार की राजधानी पटना का लोकनायक जयप्रकाश हवाई अड्डा नजदीकी हवाई अड्डा है जहा से देव की दुरी ४ घंटे में तय की जा सकती है यहाँ जाने के लिए दानापुर से भी हमेशा बस की सुविधा उपलध रहती है बस का किराया लगभग २०० से ३०० लगता है आप अपनी सुविधा के अनुसार जासकते है

सूर्यदेव देव मंदिर भारत के बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले के देव नामक स्थान पर है यह औरंगाबाद शहर  से १० किलोमीटर की दुरी पर है  यह मंदिर एक हिन्दू मंदिर है जो हिन्दू देवता सूर्य देव को समर्पित है यह सूर्य मंदिर अन्य सूर्य या मंदिरों की तरह पूर्व की और मुख्य बाला नहीं है इस सूर्य मंदिर का मुख्य पूर्व की और नहीं होकर पश्चिम की दिशा की और है यह मंदिर हिन्दू देवता सूर्य देव का ही मंदिर है



देव का सूर्य मंदिर अपनी पुरानी अनूठी शिल्प कला के लिए प्रसिध्य है इस सूर्य मंदिर को पथरो को काफी सुन्दर ढंग से तराश कर बनाया गया है इस मंदिर की नक्काशी की कला काफी सुनदर है यह मंदिर निर्माण की कला का वेजोड़ नमूना है इस मंदिर के निर्माण का काल इतिहासकार छटी से सातवी सदी के बिच होने का अनुमान करते है जबकि पोरानिक कहानी के अनुसार  यह सूर्य मंदिर का निर्माण द्वापर युग या काल का बताते है  मंदिर के निर्माण के बारे में काफी मत भेद है लेकिन इस सूर्य मंदिर का निर्माण द्वापर युग में ही हुआ होगा

कहते है की इस सूर्य मंदिर का निर्माण कृष्ण के पुत्र साम्भ ने करवाया था कृष्ण के पुत्र साम्भ के द्वारा निर्मित बारह सूर्य मंदिरों में से यह एक है इस सूर्य मंदिर के निर्माण के बारे में कहा जाता है की देव माता अदिति ने की थी इस सूर्य मंदिर के कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब देवता राक्षसो के हाथ हार गए थे तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की कामना से देवरण में छठी मैया की आराधना की थी तव छठी मैया ने उन्हे सवगुन संपन पुत्र होने का बरदान दिया था इसके उपरांत त्रिदेव रूप में सूर्य भगवान प्रगट हुआ थे जिहोने असुरो पर देवताओ को विजय दिलवाई थी उसी समय से इस स्थान का नाम देव हो गया था और छठ की परंपरा सुरु हुआ था इस मंदिर में सूर्य की पूजा आराधना होती है

इस मंदिर में पूजा करने के लिए पुरे साल भर भक्त आते है किन्तु बिहार और उत्तेर प्रदेश के भक्त ज्यादा छठ के समय यहाँ आते है इस समय यहाँ काफी भीड़ जमा होती है यहाँ प्रति दिन हजारो भक्त आते है यहाँ खास कर शनिबार के दिन यहाँ भक्त हवन और पूजन के लिए आते है प्राचीन मानता है की जो भक्त यहाँ आता है वो कभी भी यह इस सूर्य मंदिर से खाली हाथ लोट कर नहीं जाता है जब भक्तो को मनो बांछित फल की प्राप्ति होती है तब यहाँ आकर भक्त कार्तिक या चेत्र के महीने में आकर छठ पूजा करते है ऐसा माना जाता है की इस मंदिर को 100 फुट लम्बा और चोरा बनाया गया है जिसमे छाता की तरह शीर्ष स्थान है यहाँ भगवान् सूर्य की पूजा करने और ब्रहम कुंद में स्नान करने की परम्परा है यह तीर्थ यात्री विदेशो से भी इस मंदिर में पूजा करने के लिए आते है विशेष कर यहाँ छठ के समय काफी भीड़ होती है यह सूर्य मंदिर देश के बारह सूर्य मंदिरों में प्रमुख्य है आप यहाँ एक बार जरुर आकर सूर्य भगवान् का दर्शन पूजन करे

 

लेखक स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज

यह लेख स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज की निजी लेख है अंडर कॉपीराइट एक्ट के अधीन है

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

सिंहेश्वर का शिव मंदिर मधेपुरा -बिहार का वैजनाथ सिंहेश्वरनाथ शिव मंदिर

 

बिहार का बैजनाथ -सिंहेश्वर का शिव मंदिर मधेपुरा

 

कोशी का बैजनाथ -सिंघेस्वर का शिव मंदिर मधेपुरा मधेपुरा जिले में है यह मंदिर त्रेता युगीन मंदिर है यह कोशी नदी के सहायक नदी के किनारे अब्स्थित है यह सृंगी ऋषि की तप स्थली के रूप में प्रसिध्य है

यह़ॉ आने  के लिए आपको बिहार की राजधानी पटना रेल सड़क या हवाई मार्ग से आना होगा पटना पुरे देश से रेल सड़क या हवाई मार्ग से ज़ुरा हुआ है पटना पहुचने के बाद आपको रेल से  कोशी का बैजनाथ -सिंघेस्वर का शिव मंदिर मधेपुरा आने के लिए  दौरम मधेपुरा रेलवे स्टेशन आना होगा पटना से सीधे कोशी एक्सप्रेस या जनहित एक्सप्रेस  दौरम मधेपुरा आती है आप सीधे रेल से यहाँ पहुच सकते है यहाँ से कोशी का बैजनाथ -सिंघेस्वर का शिव मंदिर  की दुरी करीब ९ किलोमीटर है स्टेशन परिसर में ही काफी ऑटो लगी रहती है जो आपको सीधे २० रुपये में सिंघेस्वर मंदिर के हाथी गेट के पास पहुचा  देगी   जहा से मंदिर १०० मीटर की दुरी पर है सड़क से ही मंदिर का शिखर दिखाई देता है मंदिर के पुरबी गेट के पास ही शिव गंगा सरोबर है

सड़क मार्ग से आप देश के किसी भी कोने से सहरसा पहुच सकते है जहा से सिंघेस्व्वर शिव मंदिर ३० किलोमीटर पूरब की और है सहरसा से बस या ट्रेन ऑटो से आप मंदिर सीधे पहुच सकते है

हवाई मार्ग से आने के लिए पटना का जय प्रकाश हवाई अड्डा और दरभंगा का हवाई अड्डा नजदीक है देश के सभी भागो से पटना सीधी हवाई सेवा है जहा आने के बाद आपको फिर ट्रेन या बस से ही सिघेस्वर मंदिर तक पहुचना होगा

मंदिर के प्रागनं में ही काफी फुल के दुकान है यहाँ से आप पूजन सामग्री खरीद सकते है यह मंदिर काफी पुराना है यहाँ सावन के महीने में भक्त गंगा जल अरपर्ण करते है मंदिर के प्रागन के बिच में  शिव लिंग है जहा प्रितिदीन हजारो शिव भक्त जल अर्पित करते है शिव मंदिर के ठीक पुरबी किनारे की और पहले गणनायक गणेश जी का मन्दिर है शिव मंदिर के ठीक पूरब उत्तर ब्किनारे की और माता पार्वती का मंदिर है इसके अतिरिक्त शिव मंदिर के चारो और और कई मंदिर है जिसमे से भैरव मंदिर राम जी का मंदिर हनुमान जी का मंदिर प्रमुख्य है मंदिर परिसर में दो कुआ है जिसका जल भागवान शिव और माता पार्वती को भक्त अर्पित करते है

सिंघेस्वर का शिव मंदिर के आस पास कई धरम शालाये भी है जहा आप मामूली शुल्क देकर रुक सकते है यहाँ मंदिर के आस पास कई निजी होटल भी है जहा रुकने की उचित सुविधा है यहाँ इस मंदिर परिसर में शिव रात्रि के अबसर पर काफी बड़ा मेला लगता है जहा इसे देखने पुरे देश से भक्त आते है पहले यह मेला सोनपुर मेला के बाद दुसरे स्थान पर आता था जहा हाथी घोड़े अवम अन्य जानबरो की बिक्री होती थी लेकिन अब मेला सिमित हो गया है लेकिन यह मेला एक महीने तक लगता है जहा पुरे देश  के व्यापारी अपने सामानों की विक्री के लिए आते है

सिंघेस्वर का शिव मंदिर एक अनूठा शिव मंदिर है आप अगर मंदिर के अन्दर शिव लिंग को देखेंगे तो ऐसा प्रतीत होगा जैसे इसे कई युगों से है यह शिव लिंग शम्भू है इसकी कहानी काफी रोचक और पुरानी है कहते है की त्रेता युग में जब राजा दसरथ को संतान नहीं हुआ था तब वह यहाँ के संत तपश्वी श्रृंगी ऋषि के पास संतान की कामना लेकर आये थे जिनके अनुरोध पर श्रृंगी ऋषि ने यहा पुत्र की कामना से यज्ञ  किया था जिस के हवन कुंड से अग्नि देव प्रकट  होकर राजा दसरथ को  खीर प्रदान किये थे जिससे राजा दशरथ ने अपने तीनो रानियों में बाट दिया था जिससे राजा को चार पुत्र की प्रप्ति हुए थे अग्नि कुंद में ही शिंगी ऋषि ने शिव लिंग को प्रकट किया था जो तभी से आज तक पूजित हो रहां है

इस मंदिर के आस पास काफी सुन्दर जगह है जिसका भी आप अबलोकन कर सकते है मंदिर परिसर में पण्डे है जो उचित दर पर आपको पूजा करवा देंगे मंदिर के अन्दर पण्डे हर समय मोजूद रहते है जो आपकी हर तरह की पूजा संपन करते है यहाँ मंदिर परिसर में बारहों महिने विवाह  होता है जहा पुरे बिहार समेत नेपाल से विवाह के लिए ग्रामीण आते है यहाँ के मंदिर में विवाह करने की काफी पुराणी परमंपरा है  यहाँ विवाह के लिए काफी  मामूली शुल्क लिया जाता है मंदिर के आस पास कई धरम शालाये है जहा मामूली राशी पर आप धरम शालाये को किराये पर ले सकते है यहाँ शिवरात्रि के अबसर पर काफी बड़ा मेला का आयोजन किया जाता है जहा देश विदेश के दुकानदार अपने समानो की बिक्री हेतु आते है पहले यह मेला सोनपुर के पशु मेले के बाद  एशिया का सबसे बड़ा पशु मेले के रूप में जाना जाता  था परन्तु अब यह मेला काफी सिमट गया है मंदिर के आस पास काफी निजी होटल भी है जहा आपको रहने के लिए कमरे आशानी से मिल जाते है यहाँ काफी खाने पिने की भी दुकाने है मंदिर के उत्तेर की और काफी बड़ा पशु बाजार है जहा हर समय पशु मिलते है यहाँ गाय भैस बकरी की काफी नस्ल मिलते है अब यह मेला एक महीने तक लगता है मंदिर के उत्तरी और से पहले नदी बहती थी लेकिन अब वह एक नाले के रूप में रह गयी है 

आप यहाँ जरुर आकर इस बिहार के इकलोते शिव मंदिर का दर्शन पूजन जरुर करे आप हमारे पोस्ट हमारे इस वेबसाइट पर भी जाकर पढ  सकते है 

https://nirmalsevasansthan.wordpress.com

लेखक स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज

कांटेक्ट आर अंडर कॉपीराइट एक्ट @स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज

 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

श्री रक्त काली मंदिर,मत्स्यगंघा सहरसा -THE MOST FAMOUS TEMPLE IN BIHAR -

THE MOST FAMOUS TEMPLE IN BIHAR - श्री रक्त काली मंदिर,मत्स्यगंघा सहरसा  

श्री रक्त काली मंदिर,मत्स्यगंघा सहरसा कोशी क्षेत्र के सहरसा जिले के मुख्य शहर के उतरी छोर पर है यह मंदिर सहरसा रेलवे स्टेशन से करीब ३ किलोमीटर उतर दिशा में है यहाँ आने के लिए आपको सहरसा आना होगा सहरसा के लिए देश के हर कोने से रेलवे की सुविधा है आप देश के किस्सी भी कोने से रेल सड़क या हवाई मार्ग से  पहले बिहार की राजधानी पटना पहुचे जहा से सहरसा शहर की दुरी २३४ किलोमीटर है आप यहाँ आने के लिए रेल सड़क दोनों मार्ग चुन सकते है पटना से प्रतिदिन ट्रेन सुबह ७,१५ बजे इंटरसिटी एक्सप्रेस  अवम १२.३० बजे राजरानी एक्सप्रेस सीधी ट्रेन सहरसा जंक्शन आती है  अवम दानापुर  तथा पाटलिपुत्र से भी ट्रेन प्रतिदिन सहरसा आती है इन ट्रेनों से आप सहरसा पहुच सकते है

सड़क मार्ग से आप बस से भी सहरसा पहुच सकते है सहरसा बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से आपको ऑटो या इ रिक्शा मंदिर के लिए सीधे मिल जाएगी जहा का किराया लगभग २० रूपया है आप सीधे मंदिर परिसर पहुच सकते है

      सहरसा शहर में यह एक प्रमुख्य पूजा स्थल के रूप में बिकसित किया गया है एक बंजर जल भराव के क्षेत्र को इक खुबसूरत पर्यटन स्थल के रूप में बिकसित किया गया है इस जगह को मंदिर का रूप अवम वीरान झील को बिकसित करने का कार्य सहरसा के पूर्व डीएम श्री ट न लाल दास ने किया था इस मंदिर को जन सहयोग से बनबाया गया मंदिर नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर के तर्ज पर निर्मित किया गया है मुख्य मंदिर में माता काली की प्रतिमा है  इस परिसर में कई और मंदिर है मुख्य मंदिर काफी सुन्दर और भव्य बना हुआ है मुख्य मंदिर के ठीक उत्तर की और बाबा कारू खिरहर का मंदिर है जिसमे बाबा कारू खिरहर की प्रतिमा है मंदिर के बाहर और भीतर भी बाबा कारू की प्रतिमा लगी हुआ है मन्दिर के बगल में उत्तर की ही और से माता दुर्गा का भी मंदिर है  मुख्य मंदिर के ठीक पश्चिम की और से शिव मंदिर है जिसमे पारद का शिवलिंग है इसके दक्षिण की और नव ग्रहों की भी मंदिर है मुख्य मंदिर के ठीक पश्चिम की और भगवान श्री हनुमान जी का मंदिर है इसके बगल में हवन कुंद भी है जहा भक्त से समय समय पर पुजारियों से अपने मंगल के लिए हवन भी करवाया जाता है इसके दक्षिण में श्री राधा कृष्ण जी का मंदिर है इसमें राधा और कृष्ण जी की प्रतिमा है इसके पीछे एक छोटा सा पहार बनबाया गया है जिस पर विना के सकल में एक ढाचा निर्मित है जिसमे माता सरसवती का मंदिर है इस छोटे पहाड़ से काफी सुन्दर चारो और का नजारा नजर आता है निचे आने के के बाद माता लक्ष्मी जी का मंदिर है जिसमे माता लक्ष्मी की काफी सुन्दर प्रतिमा है इसके ही ठीक पूरब में एक पिरामिड टाइप संरचना के आकर में मंदिर बना हुआ है जिसमे ६४ योग्निया की प्रतिमाये है इस मंदिर में भैरव की प्रतिमा है जिसके चारो और ही ६४ योगनी की प्रतिमा है जिसका पूजन अर्चन किया जाता है इस मंदिर के ठीक पूरब की और बाबा लक्ष्मीनाथ गीसाईं का मंदिर है जिसमे बाबा लक्ष्मी नाथ गोसाई की प्रतिमा है जिसका पूजन अर्चन किया जाता है मंदिर परिसार काफी शांत और रमणीक बना हुआ है मंदिर के ठीक उत्तर की और एक काफी बड़ा तालाब है जिसमे बोटिंग की भी सुबिधा है यहाँ दीपावली के अबसर पर काफी बड़े मेले का आयोजन होता हो मेला अक्सर १५ दिसम्बर से १५ जनबरी तक रहता है जिसमे देश के प्रमुख्य कोने से तरह तरह के सामानो की बिक्री होती है मेला के ग्राउंड में बड़े बड़े झुला मोत का कुआ ड्रेगन झुला आदि लगते है

इस मंदिर का नाम मत्स्यगंघा क्यों रखा गया इसके बाड़े में काफी मतभेद है शायद निशाद राज की पुत्री मत्स्यगंघा के नाम झील में मत्स्यगंघा  की भी कई प्रतिमाये है आप मंदिर से जैसे ही झील की और जायेंगे तो आपको मत्स्यगंघा की प्रतिमा नज पर ही इस झील या मंदिर का नाम मत्स्यगंघा रखा गया हैर आ जाएगी पहले मत्स्यगंघा की प्रतिमा काफी सुन्दर और अछे हालत में थे लेकिन अब मत्स्यगंघा की प्रतिमा कुछ पुराणी हो गयी है झील काफी बड़ा है जिसमे बोटिंग करने का काफी अच्छा आनद आता है

मंदिर के झील के दक्षिणी किनारे पर एक होटल भी है जहा आप रुक सकते है लेकिन सहरसा मुख्य शाहर में काफी निजी होटल है जहा आप को सस्ते रेट में रूम मिल् जायेंगे मंदिर में विवाह करवाने की भी सुबिधा है यहाँ काफी दूर दूर से लोग बिबाह करवाने आते है

मंदिर परिसर के आस पास ही पूजन सामग्रियों की काफी दुकाने है जहा फुल अवम पूजन सामग्री उपलध रहती है बगल में ही खाने पिने की भी दुकाने है यहाँ माता की चुनरी नारियल और फोटो भी उपलध है इस मंदिर को नए शक्तिपिठो की भी मानता मिली है  मंदिर काफी रमणीक है यहाँ आकार भक्त काफी शांति और सुकून महसूस करते है

मंदिर का ट्रस्ट भी है जिससे कई समाज सेवा के काम किये जाते है

इस मंदिर को विश्व स्तर पर लोग पयटन की दृष्टी से देखा जाता है पयटन विभाग की और से हर साल कोशी महोसब का भी आयोजन किया जाता है आप अपने जीबन में एक बार जरुर यहाँ आकार माता काली के दर्शन पूजन करे

लेखक स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज



रविवार, 23 फ़रवरी 2025

Most popular sun temple in india –सूर्यदेव देव मंदिर औरंगाबाद बिहार

Most popular sun temple in india –सूर्यदेव देव मंदिर औरंगाबाद बिहार

 

 


सूर्य देव मंदिर औरंगाबाद बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले के देव में है जहा जाने के लिए आपको पहले बिहार की राजधानी पटना आना होगा  सड़क मार्ग से जाने के लिए पटना से देव औरंगाबाद की दुरी करीब १६० किलोमीटर है देव  के लिए पटना से हर समय  बस की सुविधा उपलध है जो अरवल ब्रिक्रम से होकर गुजरता है यह n h ९६ पर है  रेल से जाने के लिए आपको अनुग्रह नारायण रोड देव रेलवे स्टेशन जाना होगा जो चारो और से ज़ुरा हुआ है जहा से मंदिर की दुरी लगभग ३० किलोमीटर है जहा से आप बस या टैक्सी से देव मंदिर आशानी से जा सकते है  हवाई मार्ग से जाने के लिए आपको बिहार की राजधानी पटना का लोकनायक जयप्रकाश हवाई अड्डा नजदीकी हवाई अड्डा है जहा से देव की दुरी ४ घंटे में तय की जा सकती है यहाँ जाने के लिए दानापुर से भी हमेशा बस की सुविधा उपलध रहती है बस का किराया लगभग २०० से ३०० लगता है आप अपनी सुविधा के अनुसार जासकते है

सूर्यदेव देव मंदिर भारत के बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले के देव नामक स्थान पर है यह औरंगाबाद शहर  से १० किलोमीटर की दुरी पर है  यह मंदिर एक हिन्दू मंदिर है जो हिन्दू देवता सूर्य देव को समर्पित है यह सूर्य मंदिर अन्य सूर्य या मंदिरों की तरह पूर्व की और मुख्य बाला नहीं है इस सूर्य मंदिर का मुख्य पूर्व की और नहीं होकर पश्चिम की दिशा की और है यह मंदिर हिन्दू देवता सूर्य देव का ही मंदिर है

देव का सूर्य मंदिर अपनी पुरानी अनूठी शिल्प कला के लिए प्रसिध्य है इस सूर्य मंदिर को पथरो को काफी सुन्दर ढंग से तराश कर बनाया गया है इस मंदिर की नक्काशी की कला काफी सुनदर है यह मंदिर निर्माण की कला का वेजोड़ नमूना है इस मंदिर के निर्माण का काल इतिहासकार छटी से सातवी सदी के बिच होने का अनुमान करते है जबकि पोरानिक कहानी के अनुसार  यह सूर्य मंदिर का निर्माण द्वापर युग या काल का बताते है  मंदिर के निर्माण के बारे में काफी मत भेद है लेकिन इस सूर्य मंदिर का निर्माण द्वापर युग में ही हुआ होगा

कहते है की इस सूर्य मंदिर का निर्माण कृष्ण के पुत्र साम्भ ने करवाया था कृष्ण के पुत्र साम्भ के द्वारा निर्मित बारह सूर्य मंदिरों में से यह एक है इस सूर्य मंदिर के निर्माण के बारे में कहा जाता है की देव माता अदिति ने की थी इस सूर्य मंदिर के कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब देवता राक्षसो के हाथ हार गए थे तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की कामना से देवरण में छठी मैया की आराधना की थी तव छठी मैया ने उन्हे सवगुन संपन पुत्र होने का बरदान दिया था इसके उपरांत त्रिदेव रूप में सूर्य भगवान प्रगट हुआ थे जिहोने असुरो पर देवताओ को विजय दिलवाई थी उसी समय से इस स्थान का नाम देव हो गया था और छठ की परंपरा सुरु हुआ था इस मंदिर में सूर्य की पूजा आराधना होती है

इस मंदिर में पूजा करने के लिए पुरे साल भर भक्त आते है किन्तु बिहार और उत्तेर प्रदेश के भक्त ज्यादा छठ के समय यहाँ आते है इस समय यहाँ काफी भीड़ जमा होती है यहाँ प्रति दिन हजारो भक्त आते है यहाँ खास कर शनिबार के दिन यहाँ भक्त हवन और पूजन के लिए आते है प्राचीन मानता है की जो भक्त यहाँ आता है वो कभी भी यह इस सूर्य मंदिर से खाली हाथ लोट कर नहीं जाता है जब भक्तो को मनो बांछित फल की प्राप्ति होती है तब यहाँ आकर भक्त कार्तिक या चेत्र के महीने में आकर छठ पूजा करते है ऐसा माना जाता है की इस मंदिर को 100 फुट लम्बा और चोरा बनाया गया है जिसमे छाता की तरह शीर्ष स्थान है यहाँ भगवान् सूर्य की पूजा करने और ब्रहम कुंद में स्नान करने की परम्परा है यह तीर्थ यात्री विदेशो से भी इस मंदिर में पूजा करने के लिए आते है विशेष कर यहाँ छठ के समय काफी भीड़ होती है यह सूर्य मंदिर देश के बारह सूर्य मंदिरों में प्रमुख्य है आप यहाँ एक बार जरुर आकर सूर्य भगवान् का दर्शन पूजन करे

 

लेखक स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज

यह लेख स्वामी निर्मल गिरी जी महाराज की निजी लेख है अंडर कॉपीराइट एक्ट के अधीन है


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